गुरुवार, 26 जनवरी 2017

वर्ष २०१६ की यात्रायें :-

१. फरवरी २०१६ में उदयपुर की यात्रा.
२. जून २०१६ में वैष्णो देवी एवं पटनी टाप की यात्रा,
३. अगस्त २०१६ में चार देशोंं (इटली, आस्ट्रिया, स्विटजरलैंड,फ्रांस) की यात्रा.

१. फरवरी २०१६ में उदयपुर की यात्रा का विवरण :-

हमने वर्ष 1996 के सितंबर महीने में उदयपुर की यात्रा लक्ष्मी के साथ की थी. तब हम यहां दो सप्ताह रुके थे तथा शहर का कोना-कोना छान मारा था. अब लगभग 20 सालों बाद फिर से उदयपुर भ्रमण का कार्यक्रम बना है. दिनांक 25.02.2016 को रात में 11.30 बजे खजुराहो-उदयपुर एक्सप्रेस से जयपुर से उदयपुर के लिये प्रस्थान किया. ट्रेन करीब आधे घंटे लेट थी, एक परेशानी और थी कि हम पांच लोगों में से तीन का टिकट एस-7 में था तो दो का टिकट एस-5 में. खैर पापा और अनुराग एस-5 में गये, जबकि मैं, लक्ष्मी और शालू एस-7 में. हमारी वाली बौगी में कोई ग्रुप पीछे से आ रहा था उन लोगो ने काफी चिल्ल-पों मचा रखी थी. चुप कराने के लिये थोडी जिरह भी करनी पडी.

ट्रेन उदयपुर आधे घंटे ही लेट यानी 7.00 बजे पहुंची.  उदयपुर में रहने (होटल सर्वऋतु विलास में) एवं ट्रांसपोर्ट (ईनोवा) की बुकिंग भाई चंद्रेश जी, मुख्य प्रबंधक, सुरजपोल शाखा ने करवा रखी थी तथा ड्राइवर रमेश स्टेशन पर हम लोगों को लेने के लिये मौजूद था.




होटल से नहा-धो कर 9.30 बजे सबसे पहले सिटी पैलेस के लिये निकले. राजस्थान के सबसे बडे महलों में से एक सिटी पैलेस उदयपुर की एक खास पहचान है.  आक्रमणकारियों से परेशान होकर महाराणा उदय सिंह द्वितिय ने चितौड से राजधानी उदयपुर स्थानांतरित की तथा सन 1559 मे इस महल का निर्माण करवाया. यह पिछौला झील के पुर्वी किनारे पर स्थित है। सिटी पैलेस का प्रवेश शुल्क प्रति व्यक्ति रु.50.00 है, जबकि कैमरा शुल्क रु.200.00 है.  सिटी पैलेस महलों का एक काम्प्लेक्स है, जिसके अंदर कई महल (जैसे कृष्ण विलास महल, शीश महल, मोती महल आदि) स्थित हैं. इसके अंदर एक संग्रहालय भी है, जिसमे महाराणा शाही परिवार के कई वस्तुओं के संग्रह को प्रदर्शित किया गया है. इस महल के आधे भाग में अभी भी शाही परिवार का निवास-स्थान है. हालांकि अगर आप अच्छे से घुमें तो यहां पूरे दिन रह सकते हैं, पर समय की कमी के कारण हमने 2-2.30 घंटे में महल का चक्कर लगा लिया. 























उदयपुर में मछला मगरा पहाडी के उपर जाने के लिये इन दिनों एक रोप-वे भी बना है, जिसका बेस दीन दयाल पार्क, दुध-तलाई के पास है तथा यह उपर करणी माता के मंदिर तक जाता है. यहां से शहर का अच्छा व्यू दिखता है, इसके अलावा देखने के लिये यहां खास कुछ नही है.  सिटी पैलेस के बाद हमने इस रोप-वे का आनंद उठाया.





रोप-वे के बाद हमने सहेलियों की बाडी का रुख़ किया.  यह एक गार्डन है जिसका निर्माण महाराणा संग्राम सिंह द्वारा 18वीं सदी में परिवार की रानियों एवं उनकी सहेलियों के घुमने-फिरने तथा मनोरंजन के लिये करवाया गया था. बगीचे के अंदर फूलों की अनगिनत किस्मे क्यारियों की शोभा बढा रही थी.  इसके अंदर छोटे-छोटे तालाब बने है जिनके चारों तरफ़ काले संगमरमर की मूर्तियाँ तथा सफ़ेद संगमरमर से बनी हाथियों की मूर्तियाँ हैं.  तालाब के अंदर कमल के फूल लगाये गये है तथा हाथियों के सूंड से पानी का फव्बारा निकलता रहता है जिसकी बूंदे कमल के फूलों पर गिरकर चमकते मोतियों का अहसास कराती हैं.  शालू ने यहां फव्वारों के द्वारा बनी इंद्रधनुषों की फोटो-ग्राफी की. 
















सहेलियों की बाडी के बाद चेतक सर्किल पर एक रेस्तरां में (नाम याद नही है) लंच लिया. चेतक सर्किल पर हमे होटल गणगौर दिखा जिसमें हम 1996 मे दो सप्ताह तक रुके थे.

इसके बाद हम सज्जनगढ़ किले के लिये निकले. यहां प्रवेश शुल्क रु.10.00 प्रति व्यक्ति, कैमरे का शुल्क रु.20.00 तथा गाडी का प्रवेश शुल्क रु.50.00 है. सज्जनगढ़ किला जिसे मानसून पैलेस भी कहा जाता है मुख्य शहर से लगभग 10 किमी बाहर अरावली की पहाडी के बंसदारा चोटी पर समुद्र स्तर से लगभग 2900 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। इसका निर्माण कार्य सन 1884 में महाराणा सज्जन सिंह ने मानसून के बादलों पर नजर रखने के लिए शुरु कराया था.  सज्जन सिंह जी के असामयिक निधन के कारण महल का निर्माण बीच में ही रूक गया. बाद में महाराणा फतेह सिंह द्वारा महल का निर्माण कार्य पूरा करवाया गया. यह महल सफेद संगमरमर द्वारा निर्मित किया गया है.  हालाकि यहां उतनी हलचल (कम से कम हम जिस समय गये थे उस समय तो नही थी) नही थी, परंतु इस जगह से पिछोला झील, उदयपुर शहर और आसपास के ग्रामीण इलाकों के दृश्यों को देखने का एक अलग का आनंद प्राप्त होता है. यहां धुप तेज लग रही थी, पर तेज हवांओं के चलने के कारण वह गुनगुनेपन का अहसास दे रही थी.  यहां काफी सारे बंदर उछल-कूद मचा कर मनोरंजन कर रहे थे.
दूर से दिखता सज्जनगढ किला











सज्जनगढ के पश्चात हम महाराणा प्रताप मेमोरियल मोती मगरी गये. मोती मगरी फतेहसागर के पास ही एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है.  यहां प्रवेश शुल्क रु.20.00 प्रति व्यक्ति है. हम यहाँ करीब दोपहर 3.30 बजे के आसपास पहुंचे थे, तथा दोपहर के कारण इस समय यहां भीड-भाड नही थी.  यहां पहाड की चोटी पर महाराणा प्रताप की चेतक सवार मूर्ति है, जो कि अकबर के साथ 1575 में हल्दी घाटी युद्ध के यादगार स्वरूप बनवाया गया है. महाराणा प्रताप की तांबे से बनी मूर्ति 11 फीट उंची है तथा इसका वजन लगभग 7 टन है. चारो ओर के इलाके को सुंदर बगीचे से सजाया गया है.  यहां शाम के समय लाईट एण्ड साउंड प्रोग्राम दिखाया जाता है.  यहां एक संग्रहालय भी है जिसे देखा.














शहर के उपरोक्त वर्णित दर्शनीय स्थलों को देखने के क्रम में हमने कई बार फतेह सागर झील के चक्कर लगा लिये.  अंतत: मोती मगरी भ्रमण के पश्चात हम शहर का गौरव माने जाने वाले फतेह सागर के किनारे घुमने आये.  शाम हो जाने के कारण फतेह सागर के किनारे काफी भीड-भाड थी.  फतेह सागर एक कृत्रिम झील है जिसका निर्माण महाराणा जय सिंह द्वारा करवाया गया था. कालांतर में बाढ़ के कारण इस झील का सौंदर्य नष्ट हो गया जिसका पुनर्निर्माण महाराणा फतेह सिंह द्वारा सन 1678 में करवाया गया. इस झील का आकार नाशपाती की तरह है.  इस झील के बीचों-बीच भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के नाम पर बना नेहरु गार्डन नाम का एक बागीचा स्थित है जो लगभग 4.50 एकड में फैला है. हम बोट द्वारा नेहरू गार्डन गये. नेहरू गार्डन की रख-रखाव मुझे उतनी अच्छी नही लगी जैसी 1996 (जब हम पहली बार उदयपुर घुमने आये थे) में थी. इसके अंदर एक रेस्तरां हुआ करता था जो अब बंद था. शाम का पूरा समय हमने नेहरू गार्डन में नर्म हरी घास पर लेटे-लेटे बिताया. यहां से सन-सेट का सुंदर दृश्य दिखता है.  आखरी बोट से वापस किनारे आये तथा लगभग शाम 8.00 बजे के आसपास होटल आ गये.  काफी थक जाने के कारण चद्दर तान कर सो गये.